शतरंज की बात होते ही हमारे जहन में शतरंज खेलते हुए विश्व चैंपियन भारतीय ग्रैंडमास्टर विश्वनाथन आनंद का चेहरा उभर आता है और हमारा सर गर्व से ऊंचा हो जाता है। आनंद का कहना है कि देश के प्रत्येक स्कूल में शतरंज खेला जाए। संयोग है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शतरंज के बारे में ऐसी ही राय रखते हैं। कुछ वर्ष पहले जब भूटान नरेश भारत आए थे, तो मोदी ने उनके देढ़ वर्षीय पुत्र को भेंट में एक चैस सैट दिया था। जाहिर है कि हमारे प्रधानमंत्री शतरंज के महत्व को समझते हैं और चाहते हैं कि ये देश में एक लोकप्रिय खेल बनें।
हालांकि हिमाचल प्रदेश में कोई चैस ग्रैंडमास्टर नहीं है, परंतु यह अब शतरंज में पीछे नहीं रहना चाहता। हाल ही में प्रदेश के लिए गर्व का क्षण आया जब प्रारंभिक शिक्षा निदेशालय में संयुक्त निदेशक के पद पर तैनात हितेश आज़ाद ने गोहर स्कूल में भौतिक विज्ञान के प्रवक्ता हंस राज ठाकुर के साथ इसी वर्ष मंडी शतरंज संघ द्वारा मतदाता जागरुकता हेतु आयोजित शतरंज मैराथन में 53 घंटे 17 मिनट व 49 सैकिंड शतरंज खेल कर लगातार सबसे लंबे समय तक शतरंज खेलने कर विश्व रिकॉर्ड बनाया और दोनों ने वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में जगह बनाय़ी। स्वयं चैस के बेहतरीन खिलाड़ी होने के साथ अब वे और उनकी टीम चैस को लोकप्रिय खेल बनाने में जुटी हुई है। प्राथमिक स्कूलों से लेकर स्कैंडरी स्कूलों तक शतरंज को बच्चों का पसंदीदा खेल बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। शिक्षा विभाग अब प्रदेश के बच्चों को खंड, जिला, राज्य व राष्ट्रीय स्तर तक आयोजित प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए तैयार कर रहा है। अध्यापकों को इसके लिए प्रशिक्षित भी किया जा रहा है। इसके परिणाम स्वरूप गोहर का 13 वर्षीय सक्षम 2 बार राष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर चुका है। हाल ही पटना में अंडर-19 वर्ग की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में उसने तीसरा स्थान प्राप्त कर ब्रॉन्ज़ मैडल हासिल किया और प्रदेश का नाम रौशन किया है।
शतरंज, जिसे अंग्रेज़ी में चैस कहते हैं, दो शब्दों के मेल से बना है, शत और रंज। शत यानि सौ और रंज यानि नाराज़गी, निराशा, दुख या अवसाद। इस तरह शतरंज का मतलब हुआ सौ तरह के रंज से पार पाने वाला खेल। इसे कभी चतुरंग भी कहते थे। यह चौकोर बोर्ड या पट पर 64 चौकोर खानों में 6 तरह के 16-16 सफेद व काले मोहरों के साथ खेला जाने वाला शह और मात का वो खेल है जो जीवन को कई सबक दे जाता है। शतरंज बच्चों के बौद्धिक विकास में अहम भूमिका निभा सकता है। वैज्ञानिक ब्लेज़ पास्कल ने कहा है कि शतरंज मनुष्य के मस्तिष्क की व्यायामशाला है। जिस तरह जिम में शारीरिक कसरत की जाती है, ठीक वैसे ही शतरंज से मस्तिष्क की कसरत होती है। उल्लेखनीय है कि शतरंज खेलते समय मस्तिष्क का दांया और बांया दोनों पक्ष एक साथ काम करते हैं। जितनी कसरत दिमाग की शतरंज खेलने से होती है उतनी किसी अन्य चीज़ से नहीं। चैस की प्रत्येक चाल के बाद वैकल्पिक चालों की संख्या बढ़ती चली जाती है। एक अनुमान के अनुसार तीन चालों के बाद लगभग 9 मीलियन, चार चालों के बाद 288 बीलियन और पूरी बाज़ी में औसतन ब्रह्मांड में उपलब्ध इलैक्ट्रॉन से अधिक संभावित विकल्प होते हैं। समझा जा सकता है कि शतरंज में मस्तिष्क किस तेज़ी व विस्तृत रुप से काम करता है। जैसे इस खेल में मोहरे आड़ी तिरछी चालें चलते हैं, मस्तिष्क भी उन चालों की तरह विभिन्न संभावनाओं को तेज़ी से तलाशने लगता है। इससे मस्तिष्क की प्रोसैसिंग तीव्र हो जाती है। शतरंज में तरह तरह की परिस्थितयों से गुजरते व जूझते हुए खिलाड़ी का इंटैलिजैंस कोशैंट बढ़ता जाता है। शतरंज खेलने वाले व्यक्ति की तार्किक व वैचारिक शक्ति भी शतरंज न खेलने वालों की अपेक्षा कहीं अधिक होती है। यह मानव कल्पना, सृजनात्मकता व दूरदर्शिता को मज़बूत करता है। इससे स्मरण शक्ति तेज़ बनी रहती है। शतरंज तर्क, विचार, संभावनाओं व समन्वय की गणना का खेल है। लिहाजा यह गणित के विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगी है। आज के तनाव व अवसाद से भरे जीवन में तो शतरंज और भी महत्वपूर्ण है। यह मनुष्य को तनाव को सहने और अवसाद को मिटाने में अहम भूमिका निभा सकता है। यह शह और मात का वो खेल है जिसमें मात खाने के बाद भी खिलाड़ी जीतने की तमन्ना को नहीं छोड़ता। हारने वाला हार तो जाता है, परंतु हार नहीं मानता। हारने के बाद जीतने की तमन्ना लिए फ़िर चौकोर पट के सामने खेलने बैठ जाता है। वज़ीर या क्वीन के मर जाने भी बाद भी कई बार खिलाड़ी बाज़ी जीत जाता है। इस तरह शतरंज जीवन में हार कर भी हौंसला न छोड़ने की भावना भर देता है। इससे मनुष्य जीवन में विषम परिस्थितियों से पार पाना सीखता है। शतरंज गलतियों के विरुद्ध एक संघर्ष है। हर एक नई बाज़ी में वह अपनी गलती को सुधारता जाता है। यह तन्मयता और धैर्य के साथ लक्ष्य प्राप्ति के लिए रणनीति बनाने का हुनर भी सिखाता है।
शतरंज का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इससे बच्चों को नकारातमक कार्य में अपना समय नष्ट करने से बचाया जा सकता है। आज हमारे बच्चे नशे के गर्त की ओर जा रहे हैं। उन्हें इस खेल को खेलने के लिए प्रेरित किया जाए, तो वे काफ़ी हद तक नशे से दूर हो सकते हैं। बच्चे नकारात्मक हरकतों से दूर रहेंगे, मनोरंजन भी होगा और साथ में बौद्धिक विकास भी होगा। भारत में केवल 60 ग्रैंडमास्टर हैं, जबकि गैरी कास्परोव के रूस में लगभग 250। ऐसा इसलिए है क्योंकि रूस में शतरंज एक संस्कृति है। वहां शादी में दुल्हन को भेंट में चैस सैट दिया जाता है। हर स्कूल में चैस हो यह कोई मुश्किल काम नहीं क्योंकि इस खेल के लिए न मैदान की आवश्यकता है और न ही बहुत बड़ी धन राशि की। 300 से 400 रू में एक चैस सैट आ जाता है। कमरा तो स्कूलों में होता ही है। खेल के नियम देख लो और बस चैस शुरु। हमारे प्रदेश में भी शतरंज संस्कृति का हिस्सा बनें। इसके लिए ज़रूरी है हर बच्चा शतरंज खेलें।


0 comments:
एक टिप्पणी भेजें