ना हम कुछ हंसकर सीखे हैं ना हम कुछ रोकर सीखे हैं जो कुछ थोड़ा सीखे हैं किसी का होकर सीखे है
कहने का भाव स्पष्ट है कि सीखने के लिए स्वयं को समर्पित करना पड़ता है जिससे सीख रहे हैं उसके प्रति हृदय में सम्मान का भाव रखना पड़ता है जिस प्रकार सीखने की कोई सीमा नहीं होती उसी प्रकार सिखाने के लिए भी उम्र की कोई सीमा नहीं। जिससे सीखा जाता है उसे गुरु, शिक्षक, अध्यापक आदि- आदि कई नामों से जाना जा सकता है। आज 5 सितंबर का दिन शिक्षकों के सम्मान के रूप में अपना विशेष महत्व रखता है। इस से भी महत्वपूर्ण बात यह है कि आज के दिन महान दार्शनिक, प्रख्यात शिक्षाविद्, भारतीय संस्कृति के संवाहक, 1954में भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित 5 सितंबर 1888 को जन्मे भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिवस है। राजनीति में आने से पहले उन्होंने अपने जीवन के 40 साल अध्यापन को दिए थे। वे समूचे विश्व को एक विद्यालय मानते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है। अतः शिक्षकों को सम्मान देने के लिए उन्होंने अपने जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रुप में मनाने की बात की थी। यह दिन न केवल भारत में बल्कि विश्व के अन्य देशों में भी अलग - अलग तिथियों में मनाया जाता है। 100 से अधिक देशों में यह दिन शिक्षक दिवस के रुप में मनाया जाता है।
यूं तो हर दिन का एक विशेष महत्व होता है परंतु शिक्षक दिवस शिक्षक और विद्यार्थी के लिए एक खास दिन होता है। शिक्षक विद्यार्थियों के जीवन के वास्तविक कुम्हार होते हैं जो उनके जीवन को न केवल आकार देते हैं बल्कि उन्हें इस योग्य बनाते हैं कि वह अंधकार से उजाले की ओर चलने के लिए प्रेरित हों। समाज और देश का विकास एवं वृद्धि शिक्षा की गुणवत्ता पर निर्भर करती है जो केवल अच्छे शिक्षक द्वारा दी जाती है। देश में राजनेताओं, डॉक्टरों, इंजीनियरों, व्यापारियों किसानों, कलाकारों, वैज्ञानिकों की जरूरत को पूरा करने में शिक्षकों का अथक योगदान अविस्मरणीय होता है।
शिक्षा का वास्तविक अर्थ ही अंधेरे से उजाले की ओर ले जाना है और शिक्षक ऐसी सकारात्मक सोच को अपने छात्रों में डालता है लेकिन यह तभी संभव है जब वह स्वयं उत्साहपूर्ण सकारात्मक सोच से, विचारों से संपन्न हो।
शिक्षा और शिक्षक कभी सम्मान से देखे जाते थे। कुछ समय से आधुनिकता के दौर में शिक्षक और शिक्षा दोनों के ही मायने बदल गए हैं। शिक्षा जो समाज की धुरी है और शिक्षक जिसे विभिन्न सम्म्मानित संज्ञाओं से अभिभूत किया जाता रहा है वर्तमान समय में सबसे तिरस्कृत और अपमानित किए जा रहे हैं। समय के चक्र ने ऐसी कौन सी गति पकड़ ली कि ये दुर्दिन देखने को मिलने लगे। ऐसे भी अध्यापक शिक्षा के क्षेत्र में आए हैं जिनके चरित्र पर उंगलियां उठी हैं मतलब एक मछली ने पूरे तालाब को गंदा करने की कोशिश की है। ऐसी मछलियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करके उन्हें शैक्षिक तालाब से बाहर किया जाना चाहिए।
शिक्षा हमारे समाज का आधार है इसमें सुधार के लिए नित नए प्रयोग किए जा रहे हैं। लेकिन फिर भी शिक्षा की गुणवत्ता में उपयुक्त सुधार नहीं आ रहा है। इसका मूल कारण यह है कि हम शिक्षण विधियों में तो नित नए सुधार कर रहे हैं पर इन सब में एक शिक्षक अपमानित हो रहा है यदि शिक्षक को पूर्ण सम्मान नहीं दिया जाएगा तो कितने भी तरीके अपना लें। शिक्षा में सुधार नहीं लाया जा सकता।
शिक्षक के सम्मान से मेरा अभिप्राय है कि वर्तमान समय में शिक्षक बनने के लिए बहुत से मापदंड निर्धारित कर दिए गए हैं उन सब मापदंडों पर पूरा उतरने के बाद ही कोई व्यक्ति शिक्षक बनने के योग्य हो पाता है जो काफी हद तक सही है लेकिन एक उच्च योग्यता प्राप्त व्यक्ति को जब उसकी योग्यता से कम आंका जाता है तो गुणवत्ता की बात भूलनी होगी। छोटी कक्षाओं के लिए ऐसे प्रशिक्षित अध्यापक होने चाहिए जो विशेष रूप से छोटे बच्चों को मनोवैज्ञानिक ढंग से समझ सकें। कमीशन उत्तीर्ण अध्यापक पहले टैट (अध्यापक पात्रता परीक्षा) पास करता है फिर कमीशन की परीक्षा उत्तीर्ण करता है उसमें भी मैरिट बनती है तब कहीं जाकर अध्यापक की नियुक्ति होती है । विदेशी छात्रों को भारत में पढने का निमंत्रण देने वाले राष्ट्र को शिक्षकों की दशा व दिशा की ओर भी उचित कदम उठाने का विचार अवश्य करना चाहिए।
इतिहास गवाह है कि शिक्षकों का अपमान करने वाला राष्ट्र विकास की सीढियां नहीं चढ़ सकता। अतः शिक्षकों के लिए समर्पित महान व्यक्तित्व के जन्मदिन का सही मूल्यांकन शिक्षकों को उचित सम्मान देकर ही किया जा सकता है।
प्रियंवदा
व्याख्याता हिंदी


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