भले ही देश भर में कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए लगे लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था व सामाजिक ढांचे को तहस-नहस करने का काम किया हो लेकिन मौजूदा देशव्यापी लॉकडाउन का सबसे सकारात्मक प्रभाव वायु प्रदूषण में नाटकीय ढंग से आई कमी है। वैश्विक आंकड़े बता रहे हैं कि पिछले 60 वर्षों में किये गये तमाम प्रयासों और जलवायु परिवर्तन के असंख्य वैश्विक समझौतों के बावजूद पर्यावरणीय स्थिति में वो सुधार नहीं हो पाया था जो पिछले 60 दिनों में वैश्विक लॉकडाउन के चलते हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का एक अनुमान है कि वायु प्रदूषण के चलते हर साल क़रीब 70 लाख मौतें होती हैं। लॉकडाउन के कारण ज़हरीली गैसों के उत्सर्जन में अस्थाई कमी आना निश्चित रूप से एक बड़ी राहत है लेकिन यह कमी भारत जैसे देश के लिए कोई स्थायी समाधान नहीं है। पांच ख़रब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए देश जिस लक्ष्य को लेकर चला है वो कार्बन उत्सर्जन को बढ़ावा दिए बग़ैर हासिल नहीं हो सकता दूसरी तरफ़ हम बिना सांस लिए भी आगे नहीं बढ़ सकते। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक हेल्थ एंड एनवायरनमेंट की डायरेक्टर डॉक्टर मारिया नीरा के मुताबिक, 'अगर देशों में प्रदूषण का उच्च स्तर होता है तो कोविड-19 से उनकी लड़ाई में इस पहलू पर भी विचार करना जरूरी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वायु प्रदूषण के चलते कोविड-19 मरीजों की मृत्यु दर में इजाफा होने की आशंका है।' अमेरिका में 90 प्रतिशत मौत उन शहरों में हुई जहां वायु प्रदूषण अधिक है। इटली में हुए इस तरह के शोध में यह बात सामने आई है कि जिन जगहों पर वायु प्रदूषण अधिक है वहां कोरोना के चलते होने वाली मौतों में इज़ाफा हुआ है। इटली के उत्तरी भाग में वायु प्रदूषण अन्य इलाकों की अपेक्षा काफी ज्यादा है और यहां कोरोना से मरने वालो की संख्या भी करीब तीन गुना ज्यादा है। इटली के उत्तरी भाग में कोविड-19 की मृत्युदर 12 फीसदी है, जबकि इसके अन्य हिस्सों में मृत्युदर 4.5 फीसदी ही है। हम भूल जाते हैं दुनिया के 30 सबसे प्रदूषित शहरों में से 21 शहर तो भारत के ही हैं इनमें बहुत से शहरों में हवा की गुणवत्ता, विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय मानकों से दस गुना से भी ज़्यादा ख़राब है।
पर्यावरण हित में वैश्विक लॉकडाउन पर सहमति बन सकती है --- राजेश वर्मा
Posted by :DEE HP
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मई 29, 2020
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भले ही देश भर में कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए लगे लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था व सामाजिक ढांचे को तहस-नहस करने का काम किया हो लेकिन मौजूदा देशव्यापी लॉकडाउन का सबसे सकारात्मक प्रभाव वायु प्रदूषण में नाटकीय ढंग से आई कमी है। वैश्विक आंकड़े बता रहे हैं कि पिछले 60 वर्षों में किये गये तमाम प्रयासों और जलवायु परिवर्तन के असंख्य वैश्विक समझौतों के बावजूद पर्यावरणीय स्थिति में वो सुधार नहीं हो पाया था जो पिछले 60 दिनों में वैश्विक लॉकडाउन के चलते हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का एक अनुमान है कि वायु प्रदूषण के चलते हर साल क़रीब 70 लाख मौतें होती हैं। लॉकडाउन के कारण ज़हरीली गैसों के उत्सर्जन में अस्थाई कमी आना निश्चित रूप से एक बड़ी राहत है लेकिन यह कमी भारत जैसे देश के लिए कोई स्थायी समाधान नहीं है। पांच ख़रब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए देश जिस लक्ष्य को लेकर चला है वो कार्बन उत्सर्जन को बढ़ावा दिए बग़ैर हासिल नहीं हो सकता दूसरी तरफ़ हम बिना सांस लिए भी आगे नहीं बढ़ सकते। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक हेल्थ एंड एनवायरनमेंट की डायरेक्टर डॉक्टर मारिया नीरा के मुताबिक, 'अगर देशों में प्रदूषण का उच्च स्तर होता है तो कोविड-19 से उनकी लड़ाई में इस पहलू पर भी विचार करना जरूरी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वायु प्रदूषण के चलते कोविड-19 मरीजों की मृत्यु दर में इजाफा होने की आशंका है।' अमेरिका में 90 प्रतिशत मौत उन शहरों में हुई जहां वायु प्रदूषण अधिक है। इटली में हुए इस तरह के शोध में यह बात सामने आई है कि जिन जगहों पर वायु प्रदूषण अधिक है वहां कोरोना के चलते होने वाली मौतों में इज़ाफा हुआ है। इटली के उत्तरी भाग में वायु प्रदूषण अन्य इलाकों की अपेक्षा काफी ज्यादा है और यहां कोरोना से मरने वालो की संख्या भी करीब तीन गुना ज्यादा है। इटली के उत्तरी भाग में कोविड-19 की मृत्युदर 12 फीसदी है, जबकि इसके अन्य हिस्सों में मृत्युदर 4.5 फीसदी ही है। हम भूल जाते हैं दुनिया के 30 सबसे प्रदूषित शहरों में से 21 शहर तो भारत के ही हैं इनमें बहुत से शहरों में हवा की गुणवत्ता, विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय मानकों से दस गुना से भी ज़्यादा ख़राब है।
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