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संस्मरण - श्री सुरेश भारद्वाज, शिक्षा मंत्री, हिमाचल प्रदेश


मेरे विद्यार्थी जीवन की बात है। एक बार बरसात की छुट्टियां खत्म हुईं। स्कूल सोमवार से शुरू होना था। रोहड़ू क्षेत्र का सबसे बहुत पुराना स्कूल है..अढाल। फिर पता चला कि शनिवार से ही शुरू हो जाएगा। मुझे लगा कि गृह कार्य जिन कॉपियों में किया हैउन्हें सोमवार को स्कूल ले जाऊंगा। सो शनिवार को बिना गृह कार्य के ही स्कूल पहुंच गया। अध्यापक गोबिंद राम झिंगटा जी ने कड़क आवाज में कहा, 'लाओ सुरेश! गृहकार्य दिखाओ। मैंने खड़े होकर कहा कि सोमवार को ले आऊंगा। उसके बाद वह मेरे करीब आए और पूरी ताकत के साथ मुझे एक थप्पड़ पड़ा।

 थप्पड़ क्या था...यूं समझिए कि पांचों अंगुलियां मेरी गाल पर छप गईं। फिर तो आदत बना ली कि जो काम जिस दिन होना हैवह उसी दिन होना है। उसे लंबित रखने का कोई मतलब नहीं है। यह थे झिंगटा जीजिनका मेरे जीवन और मेरी कार्यशैली पर अब तक प्रभाव है।

 मेरे पिता जी नौकरीपेशा आदमी थेइसलिए जहां उनका तबादला होता वहां मैं भी चला जाता था। जीवन में जितने अध्यापक आएसब एक से बढ़ कर एक लेकिन जिनसे सबसे अधिक प्रभावित हुआउनमें एक झिंगटा जी थे और दूसरे थे प्रोफेसर श्यामसुंदर जी। बॉटनी पढ़ाते थे। कॉलेज था शिमला का सनातन धर्म भार्गव कॉलेज। वह पंजाब विश्वविद्यालय से नए-नए एमएससी करके आए थे। बेहद ज्ञानवान। उनकी बातें विद्यार्थियों के मन में सीधे उतर जाती थी। बाद में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में वह अध्यक्ष हुए और मैं मंत्री। उन्होंने जीवन के प्रति दृष्टि के जो आयाम जोड़ेवे अब भी साथ देते हैं। बाद में वह सत्य साई बाबा के भक्त हो गए थे।

मेरी  हायर सेकेंडरी घुमारवीं स्कूल से 1968 में हुई। उसके बाद मैं प्री मेडिकल के लिए जालंधर चला गया। फिर बीएससी शिमला से की। उसके बाद कानून की पढ़ाई की। इन सभी स्थानों पर कई अच्छे अध्यापक मिले।

 गुरु और शिष्य का संबंध संसार का एकमात्र ऐसा संबंध है जहां एक चाहता है कि मैं अपना सारा ज्ञान दूसरे को दे दूं और उसका जीवन संवार दूं। आज जो हूंकेवल अपने अध्यापकों के कारण। सबको मेरा नमन पहुंचे। 

 

साभार   दैनिक जागरण 

 

 

हिमाचल में शतरंज की संभावनाएं-- हंस राज ठाकुर


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द्यार्थी के सर्वागीण विकास हेतु शिक्षा के साथ खेलें भी परमावश्यक हैं I हर खेल का अपना महत्त्व है व विद्यार्थी अपनी रूचि व कौशल के हिसाब से खेल का चयन करता है I वर्तमान स्कूली शिक्षा में लगभग सारे खेल विद्यार्थी के शारीरिक विकास के साथ जुड़े हैं – यहाँ बात करेंगे मानसिक संवर्धन से जुड़े खेल शतरंज की I 

'शतरंज एक ऐसा खेल – नहीं है कोई जिसका मेल'

विश्वनाथन आनंद का नाम कौन नहीं जानता- पांच बार का विश्व चैंपियन वो भी अलग अलग फॉर्मेट में I हमारे देश के प्रधानमंत्री मोदी जी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे उन्होने शतरंज की खूबसूरती को पहचाना व देश के हर नागरिक के लिए इसे खेलना जरुरी बताया – उन्होने शतरंज को सौ दुखों के एक हल के रूप में परिभाषित किया I परिणामस्वरूप नयी शिक्षा नीति में भी शतरंज को तवज्जो मिली और हिमाचल प्रदेश सरकार ने अपने सौ दिन के एजेंडे में शतरंज, योग व संगीत को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने को मंजूरी दी I सौभाग्यवश, पिछले दो सालों में ही सरकार के इस मिशन को शिक्षा विभाग व प्रदेश के शतरंज प्रेमियों ने पहली से बाहरवीं कक्षा तक इसे स्कूली खेलों का अनिवार्य हिस्सा बना डाला I आज हिमाचल प्रदेश देश का ऐसा राज्य बन गया है जहाँ खेलों के साथ इसे स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा भी बनाया जा रहा है व इस दिशा में विकास के मामले में गुजरात , तमिलनाडु से अग्रणी नजर आ रहा है जो अपने आप में एक मिसाल  है I 

तत्कालीन शिक्षा सचिव हिमाचल सरकार ने दिसम्बर 2018 में संयुक्त निदेशक प्रारम्भिक शिक्षा की अध्यक्षता में राज्य शिक्षा कौंसिल सोलन की सहभागिता से प्रदेश शतरंज पाठ्यक्रम समिति का गठन किया, जिसमे प्रदेश के शतरंज प्रेमी शिक्षक भी सदस्य हैं I शिक्षक व शतरंज प्रेमी सदस्यों के सहयोग से यह कार्य जल्दी संपन्न कर लिया गया व पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने व आगामी क्रियान्वयन हेतु राज्य शिक्षा कौंसिल सोलन के पास विचाराधीन है I सरकार के एजेंडे के अनुसार बहुत जल्द प्रदेश के सरकारी स्कूलों में चैस क्लब भी देखने को मिल सकते हैं I 

शतरंज -मानसिक संवर्धन के साथ साथ विविधता का खेल है , जिसे प्रकृति भी बाधित नहीं कर सकती ,ऐसा खेल जिसे दस वर्ष का खिलाडी भी सौ वर्ष के खिलाडी के साथ खेल सकता है -जो किसी भी समय , किसी भी मौसम और किसी भी हालत में कहीं पर भी खेला जा सकता है वो भी बहुत कम खर्चे पर I वार्षिक स्कूली खेल प्रतियोगिता के दौरान बरसात में जहाँ सब मैदानी क्रीड़ायें बंद हो जाती हैं , शतरंज का खेल कमरों में भी निर्वधित जारी रहता है I सभी सरकारी विद्यालयों में माकूल खेल संसाधन भी उपलब्ध नहीं है I 

शतरंज के खेल में प्रदेश से अभी तक कोई भी खिलाडी चैस मास्टर ,फीडे मास्टर ,इंटरनेशनल मास्टर या ग्रैंड मास्टर नहीं बन पाया है क्योंकि इस छोटे से प्रदेश में सशक्त शतरंज संघ नहीं होने की वजह से ओपन स्पर्धाओं में भी कोचिंग संस्थान व प्रशिक्षण के अभाव में खिलाडी ज्यादा बेहतर नहीं कर पाए और आज तक विश्व शतरंज पटल पर कोई हिमाचली अपना रंग नहीं जमा पाया I 

पिछले दो सालों में डी.एम.सी.ए जैसे शतरंज संगठनों के चलते हिमाचल प्रदेश में शतरंज की बयार देखने को मिली है -प्रदेश सरकारी स्कूलों के बच्चों में इस खेल की बढती लोकप्रियता के साथ साथ आज लॉकडाउन जैसी परिस्थिति में जहाँ सब खेल बंद पड़े हैं , शतरंज निर्बाध रूप से ऑनलाइन प्रतियोगिताओं के रूप में आयोजित की जा रही है I यहाँ तक की इस संकट काल में शतरंज खिलाडी इस ऑनलाइन खेल से कोरोना फाइटर की मदद हेतु प्रदेश में सहयोग राशी जुटा पाये हैं I इस खेल की क्षमता से सरकार भी वाकिफ़ है I प्रदेश के शतरंज प्रेमियों को यह भी इंतजार है कि इस बार से शतरंज को अनिवार्य रूप से 19 वर्ष से कम आयु वर्ग के खिलाडियों के लिए भी नियमित रूप से लागू किया जाये -पिछले वर्ष इस वर्ग के ट्रायल में प्रदेश के 11 जिलों से लगभग 100 खिलाडियों ने भाग लिया था I 

आज प्रदेश में शतरंज प्रतिभाएं उभर रहीं हैं और विश्व भर में हुए अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि शतरंज खेलने वाले बच्चे अक्सर पढाई में भी अव्वल होते हैं I पिछले वर्ष , अप्रैल माह में मतदाता जागरूकता हेतु चुनाव आयोग की अनुमति से दो हिमाचली प्रतिभाओं हितेश आजाद व हँस राज ठाकुर ने चैस मैराथन का अनोखा विश्व कीर्तिमान बनाया I आज प्रदेश के गाँव गाँव तक स्कूलों के माध्यम से यह खेल लोकप्रिय बन रहा है जबकि योग व संगीत अभी तक दूर की कौड़ी नजर आ रहे हैं I सरकार को शतरंज के क्षेत्र में मानव संसाधन विकसित करने के साथ प्रत्येक जिला स्तर पर खेल विभाग द्वारा संचालित चैस क्लब गठित करने होंगें ताकि उसमे जिला के हर आयु वर्ग के खिलाडी मिलकर युवाओं को इस खेल में और अधिक सशक्त बना सके – प्रदेश को इंटरनेशनल मास्टर स्तर के कोच भी जुटाने होंगे तभी इस नयी पौध को सही दिशा दे पाने में हम कामयाब होंगे I आज कोविड 19 के इस मुस्किल दौर में भी यदि सरकार व शिक्षा विभाग चाहे तो प्रदेश में स्कूली स्तर पर भी घर बैठे बच्चों की ऑनलाइन शतरंज प्रतियोगिताएं आयोजित करवायी जा सकती हैं I              

( लेखक प्रवक्ता के पद पर कार्यरत है और शतरंज में विश्व रिकॉर्ड होल्डर है)

बेज़ुबान जीवों पर अत्याचार अमानवीय -- जगदीश बाली

ईश्वर ने इस संसार में रहने के लिए केवल मनुष्य को ही पैदा नहीं किया। इस पृथ्वी पर केवल मनुष्य का एकाधिकार नहीं है। सृष्टि के उस सर्जक ने इस प्रकृति को विभिन्न तरह के प्राणियों से अलंकृत किया है। उसने इस जहां को छोटे से छोटे और बड़े से बड़े जीवों से भरा है। इन सभी जीवों का इस पृथ्वी पर जीवित रहने का उतना ही हक है जितना मनुष्य का। हां, ईश्वर ने मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ प्राणि ज़रूर बनाया है। मनुष्य अन्य जीव-जंतुओं से इसलिए श्रेष्ठ व अलग है क्योंकि उसमें मनुष्यता के गुण हैं। उसमें संवेदनाएं है, दया है, सहानुभूति है और दूसरों के दर्द को समझने व महसूस करने वाला एक दिल भी है। वह अच्छे और बुरे के बीच में फ़र्क करने की सलाहियत रखता है। इन सबमें दया को मनुष्ता का सबसे बड़ा लक्षण माना गया है। यदि मनुष्य में दया नहीं तो वह जानवर की माफ़िक ही है। शास्त्रों में कहा गया है कि अहिंसा मानव धर्म का लक्षण है और प्राणियों का वध अधर्म है। जिस मनुष्य में प्राणियों के प्रति दया नहीं उसका तप-जप, शिक्षा-दीक्षा, ज्ञान-ध्यान सब निरर्थक है। मनुष्य इस सृष्टि का राजा ज़रूर है और अन्य प्राणि इसकी रयाया है। एक राजा के रूप में जीव जंतुओं का भक्षण व संहार नहीं, बल्कि रक्षण व संरक्षण उसका कर्तव्य है। कबीर दास जी ने कहा है- जीव मति मारो बापुरा, सबका एकै प्राण। हत्या कबहूं न छूटिहैं, जो कोटिन सुनो पुराण। अर्थात जीवों को नहीं मारना चाहिए क्योंकि सभी जीवों में एक जैसे प्राण होते हैं। जीव हत्या के पाप को आप पुराणों के करोड़ों वचन सुन कर भी नहीं धो सकते। 
    ऐसा नहीं है कि मनुष्य के वर्चस्व वाली इस दुनियां में पशु-पक्षियों से मोहब्बत करने वाले नहीं हैं। परंतु दुखद पहलू यह हैं कि जीव जंतुओं के साथ क्रूरता करने वालों की भी कमी नहीं हैं। कुछ दिनों पहले केरल के साइलैंट वैली फ़ॉरैस्ट में एक 15 वर्षीय हथिनी की विस्फ़ोटक पदार्थ खाने से दर्दनाक मौत हो गई। ये और भी विषादित करने वाला विषय है कि हथिनी गर्भवती थी। वह तीव्र पीड़ा को तीन दिन तक एक तालाब में खड़े-खड़े सहती रही और अंतत: अपने अजन्में बच्चे के साथ उसकी मौत हो गई। उसकी मौत के साथ इंसानियत की भी एक बार फ़िर मौत हो गई। इसी तरह की ह्र्दय विदारक घटना हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर के झंडूत्ता के डाढ गांव में भी सामने आयी है। यहां कुछ दिनों पहले विस्फ़ोटक पदार्थ चबाने से एक गर्भवती गाय बुरी तरह घायल हो गई। देवभूमि हिमाचल के लिए यह घटना कलंकित करने वाली ही कही जा सकती है। गाय या हथिनी मे से किसी ने शौक से स्वत: ही विस्फ़ोटक पदार्थ खा कर आत्महत्या करने की कोशिश तो नहीं की होगी। इन कुकृत्य के लिए मनुष्य ही जिम्मेदार रहा होगा। इन घटनाओं के सिलसिले में गिरफ्तारियां भी हुई हैं। वैसे जानवरों से क्रूरता की ऐसी घटनाएं अकसर सामने आती रहती हैं। 
    आपको याद होगा जुलाई 2016 में चिन्नई में एक कुतिया से क्रूरता का दिल रुला देने वाला मामला भी सामने आया था। सोशल मीडिया में वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमें एक युवा एक कुतिया को छत की टैरैस से नीचे फ़ेंकता हुआ दिखाई देखा जा सकता है। अच्छा ये हुआ कि कुतिया बच गई और कार्तिक डंडपानी नामक एक जीव प्रेमी स्वयंसेवी ने इस कुतिया को गोद ले लिया और इसका नाम भद्रा रखा। रोचक है कि भद्रा से मिलने सदाशिवम नामक 68 वर्षीय जंतु प्रेमी कोयंबतूर से चिन्नई पहुंचा और उसने इस कुतिया को गले लगा कर बेज़ुबान जीव के प्रति अपना स्नेह जताया। दुखद है कि इस घटना को अंजाम देने वाले जो दो युवक थे, वे मैडिकल के छात्र थे अर्थात डॉक्टर बनने वाले थे। ये वाक्या दर्शाता है कि जहां जानवरों से प्रेम करने वाले मानवादी मौजूद हैं वहीं इन बेज़ुबान जानवरों से अमानवीय व्यवहार करने वाले लोग भी जहां-तहां मिल जाते हैं। कुछ रोज़ पहले सोशल मीडिया पर एक और वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक शख्स ने मिलन करते नाग-नागिन के जोड़े को काट डाला। 
    विडंबना है जहां एक ओर हम वानरराज हनुमान की पूजा करते हैं और उनकी 108 फ़ुट ऊंची प्रतीमा स्थापित कर अपनी आस्था का दंभ भरते हैं, वहीं दूसरी ओर वानरों की हत्या की खबरें देवभूमि हिमाचल में सामने आ रही हैं। कारण ये कि वे हमारी फ़सलों को नष्ट कर देते हैं। बंदरों को भगाने के कई और तरीके भी हो सकते हैं। जंगल पर्याप्त नहीं होंगे, तो भूख मिटाने के लिए खेतों की ओर रुख करेंगे। एक तरफ़ हम राजा शिबि की बात गर्व से करते हैं जिन्होंने कबूतर के मांस के बदले अपना पूरा शरीर बाज़ के समक्ष भक्षण के लिए रख दिया था, वहीं दूसरी तरफ़ बेझिझक पशु-पक्षियों का शिकार व मांस भक्षण को हम मानव का अधिकार समझते हैं। कहने को तो हम गाय को माता कह देते हैं, पर हमारी कथनी और करनी में बहुत अंतर है। जब तक गाय दूध देती है, तब तक उसका भरण-पोषण ठीक तरह से किया जाता है। परंतु जब वह दूध देने के काबिल नहीं रहती तो उसे जंगलों में हांक दिया जाता है। वैसे तो हम नंदी बैल की भी पूजा करते हैं, परंतु जहां बैलों से खेती नहीं की जाती, वहां बछड़ा पैदा होने पर उसे इतना कम भोजन दिया जाता है कि वह स्वयं मर जाता है या थोडा बड़ा होते ही उसे भी जंगल में छोड़ दिया जाता है। अगर ऐसा न होता तो सड़कों पर आज इतने सारे गाय-बैल कहां से आ रहे हैं। कसाईखानों में किस तरह जानवरों को तड़पा-तड़पा कर मौत के घाट उतारा जाता है, ये किसी से छुपा नहीं। आज भी धार्मिक स्थलों पर खास मौकों पर सैकड़ों बेज़ुबान बकरों की गर्दनें सरेआम अलग कर दी जाती हैं। आस्था का ढोल पीटने वाले इसे देवी देवताओं को खुश करने की परंपरा का हवाला देते हुए इसे जारी रखे हुए हैं। पहले तो कई बातें हुआ करती थीं जो आदमी के सभ्य होते-होते बदल गयीं। परंतु मालूम नहीं क्यों अंधविश्वास से भरी हुई ये धारणाएं आज भी बनी हुई हैं। पशु-पक्षी बोल नहीं पाते। इसका मतलब ये नहीं कि उन्हें दर्द और पीड़ा नहीं होती। यदि जानवरों से मनुष्य के जीवन को खतरा हो जाए, तो उस स्थिति में जानवरों का हनन उचित माना जा सकता है, परंतु बिना प्रयोजन के ही बेज़ुबान जीवों की हत्या कर देना, उन्हें पीड़ा पहुंचाना कहां का धर्म है, कहां का न्याय और कैसा अधिकार? याद रखो कुदरत अपना बदला कई रूपों में कई गुणा बढ़ा कर लेती है।

कैसे बढ़े शिक्षा की गुणवत्‍ता : एक शिक्षक का दृष्टिकोण - डॉ मामराज पुंडीर ( विशेष कार्य अधिकारी शिक्षा मंत्री , हिमाचल सरकार)

शिक्षक समाज की सर्वाधिक संवदेनशील इकाई है। शिक्षको को समाज में जो इज्जत, मान सम्मान मिलती थी वह समय रहते बदलती गई।विश्व गुरु कहलाने वाला और गुरु नगरी कहलाने वाला हमारा यह देश जिसमे भगवान राम के गुरु वशिष्ठ, भगवान् कृष्णा के गुरु सांदीपनी, और द्रोणाचार्य और चाणक्य जेसे शिक्षको ने जन्म लिया था और विश्व  विख्यात विभुतियों को निखारा था। उस समय गुरुओं को गुरु का सम्मान और आदर मिलता था। गुरु भी गुरु की भूमिका  निभाते रहें थे। राजाओं ने भी अपने दरबार में गुरुओं के लिए उच्चित स्थान के साथ साथ उचित्त सम्मान की व्यवस्था होती थी। राजा के दरबार में अगर गुरु का आना हो जाएँ  तो राजा उसे  अपना सोभाग्य मानते थे । गुरुओं ने भी गुरुकुल में अपने शिष्य को निहारने का काम बखूभी निभाया।
आधुनिकता के इस युग में  समय ने ऐसी करवट ली और गुरु गुरु से अध्यापक, फिर शिक्षक और अब मास्टर हो गये। और सम्मान और गरिमा दोनों को खोता देख अध्यापको ने भी समाज से समझोता कर लिया।

समाज ने भी अध्यापको को कोसने और गरिमा गिराने का कोई भी मौका नही जाने दिया। जब भी मौका मिला, सभी ने चाहे वह अधिकारी हो या नेता ,चाहे वह कर्मचारी हो या क्लर्क, सभी ने सिर्फ मौके के हिसाब से गुरुजनों को कोसने का काम किया। हालात यह हो गये कि अपने सम्मान को बचाने में लगे गुरुओं को समाज ने अपने अपने तरीके से कोसना शुरू कर दिया । नेता और अधिकारी यह भूल गये कि शायद उनको यहाँ तक पहुचाने में कुछ योगदान उस अध्यापक का भी है जिसे कोसने मे उसे आनन्द आता है ।
देश के कई राज्यों मे तबादला निति लागु करके एतिहासिक फेसला लिया है । देश के बाकि राज्य जिसमे हिमाचल प्रदेश भी शामिल है इस दिशा में अग्रसर है ।तबादला कानून में हिमाचल कोई फेसला कर जाएँ इसकी सभावना कम ही लगती है।क्योकि राज नेता और अधिकारी इसको लागु करवाने के लिए उत्सुक नही, क्योकि अधिकारियो और नेताओं का कोई न कोई विभाग मे सेवाए दे रहा होता है। कुछ संगठनो के पदाधिकारी भी इसका विरोध करेंगे । वजय साफ़ है शहर से लगाओ उनको विरोध के लिए मजबूर करता है। और यह सिर्फ हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य में दस प्रतिशत से ज्यादा नही। परन्तु मेरा यह मानना है कि अपने खोये हुए सम्मान के लिए सभी शिक्षको को इसका स्वागत करना होंगा और तबादला होने या करवाने में जलील होने से बचना होंगा ।
शिक्षक  अपना काम ठीक तरह से नहीं करते- यह आरोप तो सर्वत्र लगाया जाता है। लेकिन यह विचार कोई नहीं करता कि उसे पढ़ाने क्यों नहीं दिया जाता ? आए दिन गैर-शैक्षिक कार्यों में इस्तेमाल करता प्रशासन, शिक्षकों की शैक्षिक सोच को, शैक्षिक कार्यक्रमों को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है। बच्चों को पढ़ाना-सिखाना सरल नहीं होता और न ही बच्चे फाईल होते हैं। प्रशासनिक कार्यालय और अधिकारीगण शिक्षा और शिक्षकों की लगातार उपेक्षा करते हैं। उन्हें काम भी नहीं करने देते। इसी कारण स्कूली शिक्षा में अपेक्षित सुधार सम्भव नहीं हो पा रहा है।

स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए हमें स्कूलों के बारे में अपनी परम्परागत राय को बदलना होगा। अभी स्कूलों को कार्यालय समझकर, शिक्षकों को प्रतिदिन अनेक प्रकार की डाक बनाने और आँकड़े देने के लिए मजबूर किया जाता है। इससे बच्चों की पढ़ाई में व्यवधान होता रहता है। बच्चे अपने शिक्षकों से सतत् जुड़े रहना चाहते हैं, विशेषकर प्राथमिक स्तर पर। अत: स्कूलों को कार्यालयीन कामकाज से वास्तव में मुक्त कर सभी प्रदेशो में ज्यादा से ज्यादा प्रभावी शिक्षण संस्थान को  बनाया जाना चाहिए।
विद्यालय बनाम सामुदायिक शिक्षण केन्द्र

हमारे शासकीय विद्यालय बाल शिक्षण (6-14 आयु वर्ग के बच्चों) के लिए कार्य कर रहे हैं। शिशु शिक्षण के लिए संचालित आँगनवाड़ी और प्रौढ़ शिक्षा के लिए कार्यरत सतत् शिक्षा केन्द्रों का सम्बंध विद्यालय से कहने भर को है। वास्तव में इन सभी के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। यदि इन तीनों एजेंसियों को एकीकृत कर दिया जाए तो 3 से 50 वर्ष तक के लिए शिक्षण की बेहतर व्यवस्था सम्भव है|
यह भी जरूरी है कि आँगनवाड़ी कार्यकर्ता, शिक्षक और सतत शिक्षा केन्द्रों के प्रेरक को एक साथ मिल-बैठकर कार्य करने के लिए तैयार किया जाए। यदि तीनों एजेन्सी एकीकृत स्वरूप में कार्य करने लगे तो सम्भव है स्कूल की कार्यावधि 12 से 14 घण्टे प्रतिदिन तक हो जाए। साथ ही समुदाय के सभी वर्गों के लिए स्कूल में प्रवेश और सीखने के अवसर बढ़ सकते हैं।
अभी अधिकांश स्कूल अन्य सरकारी कार्यालयों की तर्ज पर  10 से 5 की अवधि में ही खुलते हैं। इस कारण से रोजगार में जुटे परिवारों के बच्चों के लिए वे अनुपयोगी सिध्द हो रहे हैं। स्कूल की समयावधि सरकारी नियंत्रण में होने के कारण बच्चों की उपस्थिति और सीखने का समय कमतर होता जा रहा है। स्कूली उम्र पार कर चुके किशोरों, युवाओं, महिलाओं और कामकाजी लोगों के लिए स्कूल के दरवाजे एक तरह से बन्द ही हैं। विद्यालय समाज की लघुतम इकाई के रूप में ''सामाजिक शिक्षण केन्द्र'' के रूप में कार्य कर सकते हैं। इस परिकल्पना को साकार करने की दिशा में पहल किए जाने का दायित्व स्थानीय ''पालक शिक्षक संघ'' पूरा कर सकते हैं। अगर समाज की जरूरत के चलते चिकित्सालय और थाने दिन-रात खुले रह सकते हैं, तो यह भी उतना ही आवश्यक है कि विद्यालय कम-से-कम 12-16 घण्टे जरूर खुलें।
शिक्षक-छात्र अनुपात ठीक हो
शैक्षणिक सुधार में शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। पाठयपुस्तकों और पाठयक्रम के अनुरूप प्रभावी शिक्षण, शिक्षकों की योग्यता, सक्रियता और पढ़ाने के कौशल पर निर्भर है। एक शिक्षक, एक साथ कितनी कक्षाओं के कितने बच्चों को भली-भाँति पढ़ा सकेगा, इस बारे में गम्भीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है।
आदर्श रूप में एक शिक्षक अधिकतम 20 बच्चों को ही ठीक प्रकार पढ़ा सकता है। वह भी तब, जब वे भी एक समान स्तर के हों। अभी व्यवस्था यह है कि एक शिक्षक 40 बच्चों को (और वे भी अलग-अलग स्तरों के हैं) पढ़ाएगा। अनेक स्कूलों में तो 70-80 से भी अधिक बच्चों को पढ़ाना पड़ रहा है। ऐसे में शिक्षक मात्र बच्चों को घेरकर ही रख पाते हैं पढ़ाई तो सम्भव ही नहीं। शिक्षक बच्चों को पढ़ा भी पाएँ, इस हेतु शिक्षक-छात्र अनुपात को व्यवहारिक बनाना होगा।
प्रशिक्षण, शिक्षण और परीक्षण
स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए शिक्षण विधियों, प्रशिक्षण और परीक्षण की विधियों में भी सुधार करने की जरूरत है। अभी शिक्षण की विधियाँ राज्य स्तर से तय की जाती हैं। कक्षागत शिक्षण कौशलों को या तो नकार दिया जाता है या उन्हें परिस्थितिजन्य मान लिया जाता है।
अच्छे प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण का दायित्व कर्तव्यनिष्ठ, योग्य और क्षमतावान प्रशिक्षकों को सौंपा जाना चाहिए। शिक्षकों के प्रशिक्षण को प्रभावी बनाने, शिक्षण में नवाचारी पध्दतियाँ विकसित करने सहित परीक्षण (मूल्यांकन) की व्यापक प्रविधियाँ तय कर उन्हें व्यवहारिक स्वरूप में लागू करने की दिशा में कारगर कदम उठाने की दृष्टि से यह आवश्यक है कि हर प्रदेश में एक ''शैक्षिक संदर्भ एवं स्त्रोत केन्द्र'' विकसित किया जाए।
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार मूलक परियोजनाएँ
शिक्षा के क्षेत्र में अनेक संस्थाएँ कार्यरत हैं। रोजगार और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी शासकीय स्तर पर परियोजनाएँ और कार्यक्रम लागू किए गए हैं। मानव विकास के बुनियादी सूचकांक होते हुए भी इनमें तालमेल न होने के कारण इनकी गति अपेक्षित नहीं है। धन की गरीबी से ज्ञान की गरीबी का विशेष सम्बंध है। ग्रामीण दूरस्थ अँचलों में ज्ञान की गरीबी पसरी हुई है। जानकारी के अभाव में वे संसाधनों का उपयोग नहीं कर पाते। अनेक परियोजनाओं के बावजूद उनकी प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक चिकित्सा और बुनियादी रोजगार की प्रक्रियाएँ बाधित होती हैं। अब समय आ गया है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए लागू परियोजनाओं को समेकित ढ़ंग से किसी सुनिश्चित क्षेत्र में लागू कर परिणामों की समीक्षा की जाए। अच्छे परिणाम आने पर उन्हें पूरे देश भर में लागू किया जाए। इस प्रकार हम अपने संसाधनों और मानवीय क्षमताओं का बेहतर उपयोग कर सकेंगे जिससे शिक्षा के गुणात्मक विकास की संभावनाएँ बढ़ेंगीं।
पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें
अभी वास्तव में यह ठीक प्रकार तय ही नहीं है कि किस आयु वर्ग के बच्चों को कितना सिखाया जा सकता है और सिखाने के लिए न्यूनतम कितने साधनों और सुविधाओं की आवश्यकता होगी। नई शिक्षा नीति 1986 लागू होने के बाद न्यूनतम अधिगम स्तरों को आधार मानकर पाठ्यपुस्तकें और पाठ्यक्रम तो लगातार बदले गए हैं, लेकिन उनके अनुरूप सुविधाओं और साधनों की पूर्ति ठीक से नहीं की गई है। यह सोच भी बेहद खतरनाक है कि पाठ्यपुस्तकों के जरिए हम भाषायी एवं गणितीय कौशलों और पर्यावरणीय ज्ञान को ठीक प्रकार विकसित कर सकते हैं। यथार्थ में पाठ्यपुस्तकें पढ़ाई का एक छोटा साधन मात्र होती हैं साध्य नहीं। कक्षाओं पर केन्द्रित पाठयपुस्तकों और पाठ्यक्रम को श्रेणीबध्द रूप में निर्धारित करना भी खतरनाक है। बच्चों की सीखने की क्षमता पर उनके पारिवारिक और सामाजिक वातावरण का भी विशेष प्रभाव पड़ता है, अत: सभी क्षेत्रों में एक समान पाठ्यक्रम और एक जैसी पाठ्यपुस्तकें लागू करना बच्चों के साथ नाइन्साफी है।
शैक्षिक उद्देश्य
स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए  हमें वर्तमान शैक्षिक उद्देश्यों को भी पुनरीक्षित करना होगा। शिक्षा, महज परीक्षा पास करने या नौकरी/रोजगार पाने का साधन नहीं है। शिक्षा विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास, अन्तर्निहित क्षमताओं के विकास करने और स्वथ्य जीवन निर्माण के लिए भी जरूरी है। शिक्षा प्रत्येक बच्चे को श्रेष्ठ इंसान बनने की ओर प्रवृत्त करे, तभी वह सार्थक सिध्द हो सकती है। कहा भी गया है ''सा विद्या या विमुक्तये''। अभी पढ़े-लिखे और गैर पढ़े-लिखे व्यक्ति के आचरण और चरित्र में कोई खास अन्तर दिखाई नहीं देता। उल्टे पढ़-लिख लेने के बाद तो व्यक्ति श्रम से जी चुराने लगता है और अनेक प्रकार के दुराचरणों में लिप्त हो जाता है। यह स्थिति एक तरह से हमारी वर्तमान शैक्षिक पध्दति की असफलता सिध्द करती है। अतः यह जरूरी है कि शिक्षा के उद्देश्यों को सामयिक रूप से परिभाषित कर पुनरीक्षित किया जाए।
शिक्षकों को ''शिक्षक'' के रूप में अवसर मिले
समान कार्य के लिए समान कार्य परिस्थितियाँ और समान वेतन की अनुशंसा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में और मानव अधिकार घोषणा पत्र के अनुच्छेद 21, 22, और 23 में वर्णित होते हुए भी नाना नामधारी शिक्षक मौजूद हैं। एक ही विद्यालय में अनेक प्रकार के शिक्षकों के पदस्थ रहते सभी के मन में घोषित-अघोषित तनावों के कारण पढ़ाई में व्यवधान हो रहा है। इस परिस्थिति को गम्भीरता से समझे बगैर और परिस्थितियों में सुधार किए बगैर भला शिक्षण में सुधार कैसे होगा? शासन को सभी शिक्षण संस्थाओं में कार्यरत शिक्षकों के लिए एक समान कार्यनीति, समान पदनाम, समान वेतनमान देने की नीति तय कर एक निश्चित कार्यावधि के बाद पदोन्नति देने का भी ऐलान करना चाहिए।

श्रेष्ठतम शैक्षिक कार्यकर्ता
शैक्षिक परिवर्तन के लिए शिक्षकों का मनोबल बनाए रखने और उत्साहपूर्वक कार्य करने की इच्छाशक्ति पैदा करने के लिए संगठित प्रयास करने होंगे। अभी शिक्षा व्यवस्था में बालकों और पालकों की भागीदारी न्यूनतम है, इसलिए सभी शैक्षिक कार्यक्रम सफल नहीं हो पाते हैं। स्कूलों में भी जिस प्रकार समर्पित स्वयंसेवकों की आवश्यकता है, वे नहीं हैं। अत: यह आवश्यक है कि श्रेष्ठतम शैक्षिक कार्यकर्ताओं की नियुक्ति की जानी चाहिए।
शिक्षकों का मनोबल बढ़ाया जाए
समूची दुनिया के सभी विकसित और विकासशील देशों में प्राथमिक शालाओं के शिक्षकों को आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और प्रशासनिक दृष्टि से श्रेष्ठ माना जाता है। साथ ही ऐसी शिक्षा नीति बनाई जाती है जिसमें उनका मनोबल सदैव ऊँचा बना रहे। जब तक अनुभव जन्य ज्ञान, और कौशलों को महत्व नहीं दिया जाएगा तब तक ''बालकेन्द्रित शिक्षण'' की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती है। बाल केन्द्रित शिक्षण के लिए कार्यरत शिक्षकों की दक्षता और मनोबल बढ़ाए जाने की आवश्यकता है।
यह आवश्यक है कि शिक्षकों को उनके व्यक्तित्व विकास की प्रक्रियाओं सहित ऐसे प्रशिक्षण संस्थानों में भेजा जाए जहाँ उन्हें अपने अन्दर झाँकने ,कुछ बेहतर कर गुजरने की प्रेरणा मिल सके। इस प्रशिक्षण उपरान्त उन्हें कार्यरत स्थलों पर ''ऑन द जॉब सपोर्ट'' के रूप में ऐसे सहयोगी दिए जाएँ जो उनकी वास्तविक मदद करें। किसी ऐसी संस्था को इस दिशा में काम करने की जरूरत है जो सामाजिक बदलाव के लिए व्यापक दूरदृष्टि और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ काम करने के लिए सहमत हो और उसके पास स्वयं के संसाधन भी उपलब्ध हों।
आज जरूरत इस बात की है कि किसी प्रकार पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया में परिवर्तन लाने के लिए विद्यालय प्रशासन, शिक्षकों और शैक्षिक कार्यक्रमों में तालमेल बनाया जाए। समुदाय की शैक्षिक आवश्यकताओं को पहचान कर उनकी जरूरतों के अनुरूप निर्णय लेते हुए ऐसा वातावरण बनाने की आवश्यकता है जिसमें व्यवसायिक योग्यता में वृध्दि सुनिश्चित हो। शिक्षा के प्रशासन एवं प्रबन्धन में उत्तरदायी भूमिका निभाने वाले संस्था प्रधानों की नियुक्ति और प्रशिक्षण हेतु शिक्षा विभाग एवं शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहे अन्य संगठनों को शीघ्र कारगर कदम उठाना चाहिए। संस्था प्रधानों की भूमिका को सशक्त बनाए बगैर शिक्षा में सुधार की सम्भावनाएँ अत्यन्त क्षीण रहेंगी। हिमाचल प्रदेश में अध्यापको को खास टूर से राजनितिक गलियारों में मास्टर शब्दों से संबोधन से अध्यापक को समाज हीन भावना से देखता है। इस प्रकार के प्रयोगों से राजनेताओं और अधिकारीयों को बचना होंगा।
कहते हेई जिस राज्य  में गुरु जनों का आदर नही होता वह राज्य  कभी उन्नत नही होता।
प्रशासनिक एवं प्रबन्धकीय व्यवस्थागत सुधार
शिक्षा प्रशासन की यह नियति बन गई है कि इसमें उच्च शिक्षा स्तर पर भी स्थायित्व नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर लागू राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 और कार्ययोजना 1992 में स्वीकृत अखिल भारतीय शिक्षा सेवा की स्थापना आज तक नहीं हो पाई है। लगभग हर स्तर पर निर्णायक पदों पर नियुक्त प्रशासनिक सेवा के अधिकारी शिक्षा क्षेत्र में आ रही गिरावट और असफलता के लिए उत्तरदायी नहीं माने जाते। हाँ, किसी छोटी-सी सफलता का श्रेय अवश्य हासिल करते नजर आते हैं। शिक्षा में सुधार के लिए कार्यरत शिक्षकों को समर्थन देने की दृष्टि से यह अत्यंत आवश्यक है कि शिक्षा के प्रबन्धन और प्रशासन को सुधारा जाए। म.प्र. शासन द्वारा वर्ष 2003 में गठित ''स्पेशल टास्क फोर्स'' की अनुशंसाओं को लागू किए जाने की भी आज महती आवश्यकता है जो एक दस्तावेज में सिमट कर रह गई हैं। म.प्र. देशभर में सर्वप्रथम जन शिक्षा अधिनियम तैयार कर लागू करने वाले प्रदेश के रूप में है। क्रियान्वयन के स्तर पर जरूर अनेक कार्य अभी शेष हैं जिसमें प्रमुख कार्य सभी स्तरों पर कार्यरत शिक्षा केन्द्रों के संचालन हेतु मैनुअल (संचालन मार्गदर्शिकाओं) का सृजन और उन्हें लागू करना है, ताकि कार्यरत स्टाफ बेहतर प्रदर्शन कर सके। प्रदेश के सभी जनशिक्षा केन्द्रों को प्रबन्धन और प्रशासन के प्रति उत्तरदायी भूमिका सौंपते हुए जनशिक्षा केन्द्र प्रभारी को आहरण वितरण अधिकार दिए जाने चाहिए। यह अत्यंत आवश्यक है कि समग्रत: शिक्षा व्यवस्था को नियंत्रित किए जाने हेतु राज्य की शिक्षा नीति तैयार की जानी चाहिए। कार्यरत शिक्षकों की दक्षता का सम्मान और उनकी कार्यदक्षता का उपयोग किए जाने की दृष्टि से विभागीय दक्षता परीक्षा का आयोजन कर सभी को प्रन्नोत किया जाना चाहिए। अंतत: शैक्षिक सुधार के लिए अब हमें विचार करने की बजाय कर्तव्य की ओर बढ़ना होगा।  
आज शिक्षा के क्षेत्र में वास्तविक सुधार की दृष्टि से शीघ्र सार्थक कदम उठाते हुए हमें ऐसी शिक्षण पध्दति और कार्यक्रम विकसित करने होंगे जो बच्चों के मन में श्रम के प्रति निष्ठा पैदा करें। समग्रत: एक ऐसा प्रभावी शैक्षिक कार्यक्रम बनाना होगा जिसमें –
1. पाठ्यक्रम लचीला और गतिविधि आधारित हो, साथ ही बच्चों की ग्रहण क्षमता के अनुरूप भी।
2. कक्षागत पाठ्य योजनाएँ, स्वयं शिक्षकों द्वारा तैयार की जाएँ और उन्हें पूरा किया जाए।
3. राज्य की शिक्षा नीति निर्धारण में शिक्षाविदों और कार्यरत शिक्षकों को वास्तव में सहभागी बना कर सभी के विचारों को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाए।
4. जन भागीदारी समितियाँ (पालक शिक्षक संघ) प्रबन्धन का दायित्व स्वीकारें - शैक्षिक प्रशासन तंत्र भी शालाओं में अनावश्यक हस्तक्षेप न करें। शिक्षण का अधिकार शिक्षकों को वास्तव में सौंपा जाए।
5. शिक्षण विधियों में परिवर्तन करने का अधिकार शिक्षकों को हो, प्रशासनिक अधिकारियों को नहीं।
6. कक्षाओं में शिक्षक-छात्र अनुपात ठीक किया जाए, साथ ही पर्याप्त मात्रा में शैक्षिक सामग्री की पूर्ति और शिक्षकों की भर्ती की जाए।
7. पाठ्यपुस्तकों की रचना स्थापित रचनाकारों की बजाय शिक्षकों और शिक्षा विशेषज्ञों के माध्यम से की जानी चाहिए, जो शैक्षिक दृष्टि से उपयुक्त हो।
8. शैक्षिक सुधारों को लागू करने में संस्था प्रधानों और शिक्षकों की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाए।
9. शिक्षकों के सहयोग हेतु ''राज्य शिक्षक सन्दर्भ और स्त्रोत केन्द्र'' स्थापित किए जाएँ।
10.  विद्यालयों को सामुदायिक शिक्षण के लिए उत्तरदायी बनाया जाए।
11. सभी राज्यों में तबादला निति को लागु करना चाहिए।

       विचारो से हो सकता है कोई सहमत नही होंगा, परन्तु मेरे निजी विचारो को स्वीकार करे ।

Dr Mam Raj Pundir
C/O Correstophen estate set No 35
Nera IGMC Shimla
9418890000

पर्यावरण हित में वैश्विक लॉकडाउन पर सहमति बन सकती है --- राजेश वर्मा



भले ही देश भर में कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए लगे लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था व सामाजिक ढांचे को तहस-नहस करने का काम किया हो लेकिन मौजूदा देशव्यापी लॉकडाउन का सबसे सकारात्मक प्रभाव वायु प्रदूषण में नाटकीय ढंग से आई कमी है। वैश्विक आंकड़े बता रहे हैं कि पिछले 60 वर्षों में किये गये तमाम प्रयासों और जलवायु परिवर्तन के असंख्य वैश्विक समझौतों के बावजूद पर्यावरणीय स्थिति में वो सुधार नहीं हो पाया था जो पिछले 60 दिनों में वैश्विक लॉकडाउन के चलते हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का एक अनुमान है कि वायु प्रदूषण के चलते हर साल क़रीब 70 लाख मौतें होती हैं। लॉकडाउन के कारण ज़हरीली गैसों के उत्सर्जन में अस्थाई कमी आना निश्चित रूप से एक बड़ी राहत है लेकिन यह कमी भारत जैसे देश के लिए कोई स्थायी समाधान नहीं है। पांच ख़रब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए देश जिस लक्ष्य को लेकर चला है वो कार्बन उत्सर्जन को बढ़ावा दिए बग़ैर हासिल नहीं हो सकता दूसरी तरफ़ हम बिना सांस लिए भी आगे नहीं बढ़ सकते। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक हेल्थ एंड एनवायरनमेंट की डायरेक्टर डॉक्टर मारिया नीरा के मुताबिक, 'अगर देशों में प्रदूषण का उच्च स्तर होता है तो कोविड-19 से उनकी लड़ाई में इस पहलू पर भी विचार करना जरूरी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वायु प्रदूषण के चलते कोविड-19 मरीजों की मृत्यु दर में इजाफा होने की आशंका है।' अमेरिका में 90 प्रतिशत मौत उन शहरों में हुई जहां वायु प्रदूषण अधिक है। इटली में हुए इस तरह के शोध में यह बात सामने आई है कि जिन जगहों पर वायु प्रदूषण अधिक है वहां कोरोना के चलते होने वाली मौतों में इज़ाफा हुआ है। इटली के उत्तरी भाग में वायु प्रदूषण अन्य इलाकों की अपेक्षा काफी ज्यादा है और यहां कोरोना से मरने वालो की संख्या भी करीब तीन गुना ज्यादा है। इटली के उत्तरी भाग में कोविड-19 की मृत्युदर 12 फीसदी है, जबकि इसके अन्य हिस्सों में मृत्युदर 4.5 फीसदी ही है। हम भूल जाते हैं दुनिया के 30 सबसे प्रदूषित शहरों में से 21 शहर तो भारत के ही हैं  इनमें बहुत से शहरों में हवा की गुणवत्ता, विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय मानकों से दस गुना से भी ज़्यादा ख़राब है।
अकेले वायु प्रदूषण के कारण ही भारत में प्रतिवर्ष 10 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है।  इन प्रदूषित शहरों पर कोरोना का प्रभाव बड़े पैमाने पर पड़ सकता है। । कोरोना संक्रमितों की संख्या भी देश के महानगरों में अन्य जगहों से अधिक है मुंबई में यह आंकड़ा 30 हजार से ऊपर जबिक 1 हजार से ऊपर लोगों की यहां मृत्यु हो चुकी है। दिल्ली में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 15 हजार को पार करने की कगार पर है, कोलकाता में 1700 से ऊपर तथा चेन्नई में यह आंकड़ा 11 हजार से ऊपर चला गया है। मुंबई जैसे प्रदूषित शहरों में वायु प्रदूषण लंबे समय से काफी ज्यादा है। ऐसे में सांस संबंधी बीमारियों वाले लोगों की संख्या भी ज्यादा है। कोरोना के कारण सबसे ज्यादा मरने वालों की संख्या भी महाराष्ट्र में ही हैं। गौर करने वाली बात यह भी है कि जहां कोरोना वायरस फेफड़ों पर आक्रमण करता है वहीं वायु प्रदूषण फेफड़ों को कमजोर करता है मतलब जहां वायु प्रदूषण ज्यादा होगा कोरोना का खतरा भी वहां खतरनाक रूप में रहेगा। 
देश भर में लाॅकडाउन के कारण जो पर्यावरण और हवा साफ हुई है देखने वाली बात होगी कितने दिनों तक यह साफ रहती है।  नासा की हाल ही की एक रिपोर्ट बताती कि उत्तर भारत में वायु प्रदूषण पिछले 20 साल में सबसे कम हो गया है दिल्ली में नुक़सानदेह छोटे कणों यानी पार्टिकुलेट मैटर यानी पीएम 2.5 का स्तर लॉकडाउन लागू होने के बाद काफ़ी गिरा, 20 मार्च को दिल्ली की हवा में पीएम 2.5 की मात्रा 91 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर (mg/m3) थी जो 27 मार्च को घटकर 26 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर (mg/m3) रह गई। ट्रैफिक वाहनों का धुआं हो या तमाम औद्योगिक इकाइयों के बंद होने से उनसे होने वाला उत्सर्जन शून्य के बराबर हो गया। निर्माण और खनन बंद होने से पर्यावरण को राहत मिली, नगरों से निकलने वाला कचरा कम हुआ, नदियों में पहुंचने वाले प्रदूषक तत्वों की मात्रा में भारी कमी दर्ज की गई। वायु गुणवत्ता सूचकांक बेहतर स्थिति में  पहुंचता हुआ नजर आया। यहां तक की नदियों में घुलित आक्सीजन की मात्रा में अपेक्षाकृत आश्चर्यजनक वृद्धि होने से यह पानी पीने योग्य हुआ। क्या गंगा क्या यमुना आदि अन्य महत्वपूर्ण नदियों व झीलों का जल साफ व पीने योग्य हो गया। पंजाब के जलंधर से 200 किलोमीटर दूर हिमालय के धौलाधार पहाड़ व उनपर पड़ी बर्फ साफ़ दिखाई देनी लग गई। दिल्ली की हवा साफ़ हुई तो आसमान भी चटख़ नीला दिखने लगा। चारों ओर परिंदों की चहचहाहट सुनाई देने लग गई। यह सच है कि कोविड-19 की महामारी के बाद एक बार फिर से इस बात की ओर ध्यान केंद्रित होने लगा है कि कोरोना महामारी से अर्थव्यवस्था को जो झटके लगेंगे उससे  बहुत सी इंसानी ज़िंदगियां तो बर्बाद होंगी ही साथ ही अरबों ख़रबों डॉलर के आर्थिक उत्पाद भी बर्बाद हो जाएंगे। इस की क्षतिपूर्ति यदि कहीं से दिखाई देती है तो वो है पर्यावरण, क्योंकि गर्म हो रहे वायुमंडल से दुनिया को एक गहरा अघात लगेगा। उससे निपटने के लिए नीति निर्माता, वित्तीय संस्थाएं व निवेशक यह सोचने पर मजबूर हुए हैं कि पर्यावरण संरक्षण के लिए आर्थिक पैकेज तैयार रखने होंगे। वैश्विक लॉकडाउन ने वायुमंडल के लिए वह काम कर दिया जो अब तक तमाम बड़े-बड़े हरित प्रोजेक्ट नहीं कर सके। देश की 40 फीसदी आबादी गंगा नदी पर निर्भर करती है। गंगा को साफ़ करने के लिए 20 हजार करोड़ रुपये के बजट प्रावधान से 'नमामि गंगे' प्रोजेक्ट शुरू किया गया।  देश में पिछले 60 दिनों से लगे लॉकडाउन ने जिस तरह से गंगा को साफ़ किया है उसकी लागत 20 हजार करोड़ रुपये से भी कहीं ऊपर बनती है। 
पर्यावरण पर लॉकडाउन के पड़े इस सकारात्मक प्रभाव ने दुनिया को इस बात के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्यों न पूरे विश्व में हर साल या प्रत्येक माह में कुछ दिन एक साथ आवश्यक सेवाओं और अनवरत चलने वाली इकाइयों को छोड़कर अन्य सभी गतिविधियों को बंद कर सम्पूर्ण लॉकडाउन लगाया जाए। इसके लिए एक वैश्विक समझौते पर सहमति बनानी होगी। सहमति इस बात पर भी बननी चाहिए कि लोग निजी वाहनों का सयुंक्त उपयोग करें। सार्वजनिक साधनों की उपलब्धता सुनिश्चित होनी चाहिए। निजी और सरकारी निवेश को हरित प्रोजेक्ट की ओर बढ़ावा दिया जाना चाहिए। हमें इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे देश में कोरोना से भी खतरनाक है प्रदूषित वातावरण कोरोना देर सवेर अच्छे-बुरे अनुभव दे कर चला जाएगा लेकिन उसके बाद हम पर निर्भर करता है कि हम इससे क्या सीख लेते हैं।


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