मेरे विद्यार्थी
जीवन की बात है। एक बार बरसात की छुट्टियां खत्म हुईं। स्कूल सोमवार से शुरू होना
था। रोहड़ू क्षेत्र का सबसे बहुत पुराना स्कूल है..अढाल। फिर पता चला कि शनिवार से
ही शुरू हो जाएगा। मुझे लगा कि गृह कार्य जिन कॉपियों में किया है, उन्हें सोमवार को स्कूल ले जाऊंगा। सो शनिवार को बिना गृह कार्य के ही
स्कूल पहुंच गया। अध्यापक गोबिंद राम झिंगटा जी ने कड़क आवाज में कहा, 'लाओ सुरेश! गृहकार्य दिखाओ। मैंने खड़े होकर कहा कि सोमवार को ले आऊंगा।
उसके बाद वह मेरे करीब आए और पूरी ताकत के साथ मुझे एक थप्पड़ पड़ा।
थप्पड़
क्या था...यूं समझिए कि पांचों अंगुलियां मेरी गाल पर छप गईं। फिर तो आदत बना ली
कि जो काम जिस दिन होना है, वह उसी दिन होना है। उसे
लंबित रखने का कोई मतलब नहीं है। यह थे झिंगटा जी, जिनका
मेरे जीवन और मेरी कार्यशैली पर अब तक प्रभाव है।
मेरे
पिता जी नौकरीपेशा आदमी थे, इसलिए जहां उनका तबादला
होता वहां मैं भी चला जाता था। जीवन में जितने अध्यापक आए, सब एक से बढ़ कर एक लेकिन जिनसे सबसे अधिक प्रभावित हुआ, उनमें एक झिंगटा जी थे और दूसरे थे प्रोफेसर श्यामसुंदर जी। बॉटनी पढ़ाते
थे। कॉलेज था शिमला का सनातन धर्म भार्गव कॉलेज। वह पंजाब विश्वविद्यालय से नए-नए
एमएससी करके आए थे। बेहद ज्ञानवान। उनकी बातें विद्यार्थियों के मन में सीधे उतर
जाती थी। बाद में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में वह अध्यक्ष हुए और मैं मंत्री।
उन्होंने जीवन के प्रति दृष्टि के जो आयाम जोड़े, वे अब
भी साथ देते हैं। बाद में वह सत्य साई बाबा के भक्त हो गए थे।
मेरी हायर सेकेंडरी घुमारवीं स्कूल से 1968 में
हुई। उसके बाद मैं प्री मेडिकल के लिए जालंधर चला गया। फिर बीएससी शिमला से की।
उसके बाद कानून की पढ़ाई की। इन सभी स्थानों पर कई अच्छे अध्यापक मिले।
गुरु
और शिष्य का संबंध संसार का एकमात्र ऐसा संबंध है जहां एक चाहता है कि मैं अपना
सारा ज्ञान दूसरे को दे दूं और उसका जीवन संवार दूं। आज जो हूं, केवल अपने अध्यापकों के कारण। सबको मेरा नमन पहुंचे।
साभार
दैनिक जागरण



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