कर्मचारियों के लिए ड्रेस कोड । -- राजेश वर्मा

इंसान की शख्सियत का प्रतिबिंब  है उसकी शिक्षा उसका आचरण व उसकी वेषभूषा। जब भी हम एक-दूसरे के संपर्क में आते  हैं  तो सर्वप्रथम हम एक दूसरे के पहनावे से प्रभावित होते हैं पहनावे से ही हम एक दूसरे के प्रति अपनी राय बना लेते हैं कि सामने वाली कैसी शख्सियत होगी। हमारी पोशाक केवल तन ढकने का काम ही नहीं करती बल्कि वह हमारी भावनाओं और संवेदनाओं को भी दर्शाती है। इसी पहनावे से पता लग जाता है कि व्यक्ति संवेदनशील है घमंडी है दब्बू है या आत्मविश्वासी है। जब हम किसी को साधारण कपड़ों में देखते हैं तो सबसे पहले मन में यह ख्याल आता है कि यह इंसान कितना विनम्रता से परिपूर्ण होगा वहीं इसके उल्टा यदि जींस या अन्य पोशाक पहने इंसान की बात करें तो उसके प्रति बोल्डनेस व आत्मविश्वासी होने की धारणा बनती है कहने का तात्पर्य है हमारा पहनावा हमारे व्यवहार को भी इंगित करता है। हम किसी से बातचीत करते हैं तो सर्वप्रथम उसके पहनावे को देखकर ही बातचीत की रूपरेखा तय करते हैं उदाहरण के तौर पर यदि कोई नवीनतम डिजाइन की सभ्य पोशाक पहने हुए हमारे संपर्क में आता है तो हम भी मर्यादित भाषा में सभ्यता से बात करते हैं वहीं इसके उल्ट यदि बिना इस्त्री किए हुए सलवटें पड़े कपड़े पहने इंसान से हम बातचीत करना ही पसंद नहीं करते भले ही वह हमसे ज्ञानी क्यों न हो? कहने का अर्थ है कि पोशाक ही इंसान के व्यक्तित्व को दर्शाती है। 
हम अस्पताल जाते हैं डाक्टरों को सफेद पोशाक में देखकर हमें भी एक आत्मविश्वास आ जाता है कि हां यही इंसान है जो हमें बीमारी से निजात दिलाएगा। वहीं नर्स की पोशाक से हमें अभास हो जाता है कि यही हमें दवा या इंजेक्शन देंगी। इसी तरह कोर्ट-कचहरी में काले लंबे कोट पहने व्यक्ति को हम फट से पहचान लेते हैं कि यह वकील है। इसी तरह पुलिस स्टेशन या अन्य जगह खाकी पहने व बेल्ट लगाए व्यक्ति को हम एक दम पहचान लेते हैं की यह व्यक्ति पुलिस कर्मी होगा। आप बस में सफर करो नीली वर्दी पहने शख्स को एकदम पहचान लेंगे की यह कंडक्टर है या ड्राइवर। आज जब भी हम देश के वीर सैनिकों को वर्दी में देखते हैं तो उनके प्रति तो सम्मान पैदा होता ही है साथ में उनकी इसी वर्दी की वजह से देश प्रेम का जज्बा भी पैदा हो जाता है दिल में देश के प्रति समर्पण के भाव हिलोरे मारने लग जाते हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो यह सब पहनावे के कारण ही है। 

इसी कड़ी में बात की जाए प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा सरकारी कर्मचारियों के ड्रेस कोड संबधी निर्णय को लागू करने की तो इस निर्णय का जहां  कुछेक लोगों ने स्वागत किया तो कुछेक ने इसे अपने स्वतंत्रता के अधिकार से जोड दिया। समझ से परे है जहां कुछेक विभागों के कर्मचारियों के लिए ड्रेस कोड अभिन्न अंग है वहीं कुछेक विभागों के सरकारी कर्मचारियों को इसमें आपत्ति क्यों हैं?  कुछेक सवाल हैं जो उन्हें खुद अपने अंतर्मन से पूछने चाहिए कि जब वह सरकारी सेवा में आते हैं तो वहां स्वतंत्रता के अधिकार की आड़ लेकर मनमर्जी करना कहां तक जायज है? जबकि सभी कर्मचारी सेवा नियमों में बंधे हुए होते हैं।  ड्यूटी काल में मनमाफिक स्वतंत्रता की बात बेमानी है मतलब खुद को जो अच्छा लगे उसके लिए हम अधिकारों की बात करें और जो कर्तव्य है उनसे विमुख हो जाएं। सरकारी कर्मी का एक ही ध्येय है अपनी सेवा का इमानदारी से कर्तव्य पालन करना फिर उसमें पहनावा कहां आडे आ गया। एक शिक्षक के शिक्षण में जहां अन्य चीजें महत्वपूर्ण है वहीं उसकी वेषभूषा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। एक अधेड़ उम्र का शिक्षक यदि टीशर्ट या जींस पहन कर अपना शिक्षण करे या विद्यालय में आए तो भले ही कोई खुलकर न कहे लेकिन समाज व बच्चों के मन में उसके प्रति जो विचार उत्पन्न होंगे उनका अंदाजा हर कोई स्वतः ही लगा सकता है। एक शिक्षक तभी बच्चों को अनुशासन सिखा सकता है जब वह खुद भी अनुशासन में बंधा होगा। हम आप अपने अधिकारों की आड़ में इस चीज का विरोध कर सकते हैं तो कल को वह छात्र भी इन्हीं अधिकारों की आड़ में अपनी स्कूल ड्रेस का विरोध कर सकता है यह बात भी ध्यान में होनी चाहिए।   ड्रेस कोड के इस फैसले के बाद बहुत से लोगों को कहते सुना की सरकार बताए आखिर  साधारण ड्रेस की परिभाषा क्या है तो यही सवाल उनसे भी है कि यदि कोई विद्यार्थी या उनका अपना बच्चा यह पूछे की साधारण ड्रेस की परिभाषा क्या है तो क्या वह तब भी इसका जबाव नहीं दे पाएंगे? साधारण सभ्य की परिभाषा सभी जानते हैं लेकिन हम पता नहीं क्यों हर एक निर्णय को अपने अहम से जोड कर देखने लग जाते हैं। पहनावा मात्र तन ढकने का साधन ही नहीं अपितु यह हमारी सोच का आईना भी है। वैसे भी सामाजिक स्वीकृति के प्रभाव में हम वही पहनना पसंद करते हैं जिसे समाज सही माने स्वीकार करे।

पंजाबी में एक कहावत है कि "खाएं मन भौंऊंदा, पहने जग भौंऊंदा" मतलब खाना वही चाहिए जो मन को भाए और पहनना वही चाहिए जो जग को भाए लेकिन आज अहम के आड़ में हम यह दिखाने की कोशिश में हैं कि पहनने के लिए भी मन की मर्जी करनी चाहिए वह भी ऐसी जिससे दूसरे लोग चिढ़ करें। यह एक मनोविकार ही हो सकता है बाकि कुछ नहीं। आज बहुत से विकसित देशों में शिक्षण संस्थानों व अन्य विभागों  के  कर्मचारियों के लिए ड्रेस कोड लागू है फिर हमें इससे परहेज़ क्यों? हमारे पडोसी राज्य हरियाणा में भी शिक्षण संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों पर ड्रेस कोड लागू है। उत्तराखंड में पहले ही शैक्षणिक संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों पर ड्रेस कोड लागू है तो अन्य राज्यों में भी इस तरह के नियम लागू हैं। 

प्रदेश में भी सभी विभागों में कार्यरत कर्मचारियों व अधिकारियों के लिए अपने अपने पद की गरिमा बनाएरखने हेतु ड्रेस कोड अनिवार्य होना चाहिए। जब डाक्टरों के लिए ड्रेस, पुलिस के लिए ड्रेस, परिवहन कर्मियों के लिए ड्रेस, न्यायालय में वकीलों व न्यायधीशों के लिए ड्रेस, देश के प्रहरियों वीर सैनिकों के लिए ड्रेस यहां तक की निजी क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों के लिए भी ड्रेस कोड है आप किसी भी निजी संस्थान में जाएं तो पाएंगे कि हर एक वहां एक ही पहनावे में नजर आता है  चाहे निजी बैंकों में कार्यरत कर्मचारियों की बात हो या फिर गाड़ियों के सर्विस स्टेशनों की बात हो शोरूम की बात हो या कुछ भी हर जगह ड्रेस कोड है फिर सरकारी विभागों के  कर्मचारियों को ड्रेस कोड से आपत्ति क्यों? नौकरी पाने के समय तो साक्षात्कार देते समय हम ड्रेस कोड को बड़ी तवज्जो देते हैं लेकिन नौकरी मिलते ही ऐसी कौन सी आजादी मिल जाती है जो ड्रेस कोड तुगलकी फरमान नजर आने लगता है। वैसे  भी प्रत्येक कर्मचारी का दायित्व है जब वह वेतन लेता है तो तय सेवा नियमों के तहत ही अपना कर्तव्य निर्वाह करे। पहनावा भी एक प्रकार का अनुशासन है और अनुशासन तो हर जगह होना चाहिए भले ही वह घर पर हो या कार्यस्थल पर ही क्यों न हो। जिस चीज की उम्मीद हम दूसरों से करते हैं उसकी शुरुआत क्यों न खुद से करके ही की जाए। यह बात सर्वत्र व्याप्त है एक आदमी के व्यक्तित्व में जितना व्यवहार मायने रखता है उतना ही महत्वपूर्ण होता है उसका पहनावा। यह कोई जरूरी नहीं की तडक भड़क वाली पोशाक ही आपको आधुनिक दिखा सकती है या फिर साधारण पहनावा आपको रूढ़िवादी की संज्ञा देगा। इन सबमें अहम है आपका व्यवहार लेकिन इसी व्यवहार में चार चांद लगाता है पहनावा और पहनावा होना भी ऐसा चाहिए जिससे आपके कार्य की झलक उसमें नजर आए। रही बात ऐसे निर्णयों को तुगलकी फरमान आदि की संज्ञा देने या स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़ने की तो कल को स्वतंत्रता के नाम पर यही कर्मचारी यह मांग भी कर सकते हैं कि वह कार्यालय में आकर नहीं घर से ही अपनी ड्यूटी देंगे। नियम सबके लिए जरूरी है फिर वह चाहे कोई भी क्यों न हो। अपनी सुविधा के लिए किसी भी नियम कायदे की परिभाषा गढना कतई उचित नहीं। हम जो कार्य करते हैं उसके बदले मेहनताना भी लेते हैं फिर हमे इस बात से कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए की पहनावा कैसा है। 

राजेश वर्मा 
9418326409

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