ज्ञान ही व्यक्ति को इंसान बनाता हैं जीने योग्य जीवन देता है और वह ज्ञान सिवाए एक शिक्षक के कोई नहीं बांट सकता, व्यक्ति के जीवन में जन्म दाता से कहीं ज्यादा महत्व शिक्षक का होता हैं। एक आम धारणा है कि कोई भी बच्चा जब स्कूल में आता है तो वह कोरी स्लेट होता है या वह एक ऐसा खाली बर्तन जिसे ज्ञान तत्व से भरना ही शिक्षक का दायित्व होता है लेकिन बच्चे की कोरी स्लेट से तुलना करना उसके साथ बेमानी होगी। एक बच्चा कोरी स्लेट नहीं हो सकता क्योंकि जब वह स्कूल में दाखिल होता है तो वह काफी समझ-बूझ के साथ स्कूल में आता है। उसका अपनी चारों ओर की दुनिया से एक सक्रिय सामजिक संवाद चल रहा होता है। वह अपने आस-पास की दुनिया व लोगों के बारे में पहले से ही कुछ न कुछ जान कर स्कूल आता है, बच्चे से संवाद या बातचीत करने से हमें पता चलता है कि वह कितना जानता है और उसे कहाँ-कहाँ मदद की ज़रूरत है। इसी संवाद को एक प्रक्रिया के रूप में समझने की भी ज़रूरत है।
रूस के मनोवैज्ञानिक लिव सिमनोविच वाइगोत्सकी ने सामाजिक विकास के सिद्धांत में इस चीज़ का बडे़ अच्छे तरीके से व्यवहारिक रूप से वर्णन किया है कि बच्चों के विकास में समाज व व्यवहारिक संवाद किस तरह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार सामाजिक अन्तःक्रिया बालक की सोच व व्यवहार में निरन्तर बदलाव लाती है। प्रत्येक बच्चे की संस्कृति एक दूसरे में भिन्न हो सकती है अर्थात किसी बालक का संज्ञानात्मक विकास उसके अन्य व्यक्तियों से अन्तर्सम्बन्धों पर निर्भर करता है। इसमें माता-पिता व शिक्षक एक महत्वपूर्ण अंग हैं। अपने इस सिद्धांत में उन्होंने जिक्र किया है कि बालक अपने से बड़े और ज्ञानी व्यक्तियों के सम्पर्क में आकर चिन्तन और व्यवहार के संस्कृति अनुरूप तौर-तरीके तरीके सीखते है। जैसा इन लोगों का व्यवहार व आचरण बच्चे के साथ होगा बच्चा उसे वैसे ही जीवन में ग्रहण करता जाता है। वाइगोत्सकी इस प्रक्रिया में सबमें प्रमुख तत्व या औजार व्यक्तिगत भाषा को मानते थे, इसमें बालक अपने व्यवहार को नियंत्रित और निर्देशित करने के लिए स्वयं से बातचीत करते हैं । एक शिक्षक जिस तरह से कक्षा में व्यवहार करता है बच्चे भी उसी का अनुसरण करने लग जाते हैं उदाहरण के लिए यदि कोई शिक्षक कक्षा में अभद्र व्यवहार करता है तो बच्चे भी बाद में उसी व्यवहार की नकल कर अभद्रता सीख लेते हैं वह भी अपने सहपाठियों से मजाक-मजाक में उसी व्यवहार को अपना लेते हैं, इसी तरह यदि घर में, स्कूल में या बाहर जब वह अपने दोस्तों और अन्य लोगों को काम करता व व्यवहार करता देखता है तो वह भी वैसा ही सबकुछ सीख जाता है। वाइगोत्सकी ने इसे अंतरीकरण का सिद्धांत भी कहा है। उनका मानना है भाषा संज्ञानात्मक विकास का महत्त्वपूर्ण औजार है, और आरम्भिक बाल्यकाल में ही बच्चा अपने कार्यों के नियोजन एवं समस्या समाधान में भाषा का औजार की तरह उपयोग करने लग जाता है। व्यक्ति के विकास में चल रहा यह संवाद एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
जब बच्चा स्कूल में प्रवेश लेकर कक्षा में आता है तो सबसे पहले बच्चे के संवाद से ही शिक्षक को पता चलता है की कौन सा बच्चा ग्रामीण क्षेत्र से है कौन सा बच्चा किस पारिवारिक पृष्ठभूमि से संबंध रखता है अब जैसा बच्चे का वातावरण होगा वह उसी ढंग से व्यवहार करेगा। यहां शिक्षक को चाहिए की वह हर बच्चे को एक ही तराजू से न तोले, सभी के साथ एक जैसी भाषा में संवाद न किया जाए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे स्कूलों में दो तरह के बच्चे आते हैं। एक वो जिनके घरों में शिक्षित लोग हैं वह अपने बच्चों को पहले ही घर में स्कूली वातावरण के अनुकूल बहुत सी चीजें सिखा देते हैं, परन्तु दूसरी तरफ वे बच्चे होते हैं जो इन सब सुविधाओं से वंचित होते हैं, उनका स्कूल और वहाँ की संस्कृति से कोई परिचय नहीं होता। उन्हें यहाँ सबकुछ नया लगता है। जब शिक्षक बच्चों से संवाद करता है तो उसे यह कतई उम्मीद नहीं करनी चाहिए की हर बच्चा शिक्षक के मनमाफिक जबाव देगा। जिस घर में पढ़ाई लिखाई का माहौल है वह बच्चा कक्षा में पढ़ने लिखने में आगे हो सकता है और शिक्षक उसकी प्रशंसा के लिए कुछ शब्द भी बोलता है, ठीक है प्रशंसा होनी चाहिए लेकिन जिस बच्चे का पारिवारिक वातावरण शिक्षा से कोसों दूर रहा हो उस बच्चे को कक्षा में कोई सही जबाव न देने पर अपशब्द नहीं कहने चाहिए, न ही उसे कक्षा में जलील किया जाना चाहिए। शिक्षक इस ओर कई बार ध्यान नहीं देते। सभी बच्चे अलग-अलग पारिवारिक परिवेश से आए हैं। एक बच्चा पढ़ने लिखने में परिवार की वजह से अन्य बच्चों से आगे है, तो हो सकता है दूसरा अन्य चीजों में आगे हो। जो बच्चा ग्रामीण क्षेत्र से संबंध रखता है वह गांव के मवेशियों, दूध, खेतीबाड़ी आदि के बारे में शहरी बच्चे की तुलना कहीं अधिक व्यवहारिक रूप से संवाद के माध्यम से अपने शिक्षक को कक्षा में बता सकता है और वहां अन्य बच्चों में भी इन चीजों के बारे में और जानने की उत्सुकता होगी। यह सब तभी संभव है जब हम अपने संवाद के साथ-साथ बच्चों के संवाद को भी स्वतंत्र रूप से मान्यता दें। किसी भी बच्चे में अंदर क्या कुछ छिपा है कैसा ज्ञान छिपा है वह संवाद और भाषा के माध्यम से ही बाहर आ सकता है। इसके लिए शिक्षक सबसे अहम अंग है। कई बार हम देखते थे की कक्षा में किसी छात्र ने यदि कुछ गलत जबाव दे दिया तो शिक्षक उसे डांट डपट देता है जबकि अगली बार उसी बच्चे से किसी अन्य प्रश्न का उत्तर इसलिए नहीं पूछा जाता की वह गलत ही बोलेगा, या वह बच्चा जानते हुए भी जबाव नहीं देता इस डर से कि कहीं गलत हुआ तो उसे दुबारा डांट सुनने को मिलेगी। बच्चों और शिक्षकों के बीच सहानुभूति और देखभाल के साथ संवाद पहला और एक महत्वपूर्ण अंग है। एक सहज संवाद बच्चे व शिक्षक के आपसी रिश्ते को बनाने में मदद करता है। जिस तरह घरों में बच्चे व माँ-बाप के बीच संवाद का आपसी रिश्ता स्वाभाविक तौर पर बन जाता है। वैसा ही संबंध शिक्षक और बच्चों में भी बनना जरूरी है, यह रिश्ता आगे आने वाली कक्षाओं में होने वाली प्रत्येक गतिविधि के दौरान उनको साथ-साथ काम करने के लिए एक मज़बूत आधार दे सकता है।
यह बात सही है कि कक्षा में विद्यार्थी को अपने विचारों को व्यवस्थित रूप से रखना होता है, उनसे औपचारिक किस्म के संवाद की अपेक्षा होती है लेकिन इसके लिए प्रशिक्षण व उम्र से जुड़े कुछ अनुभवों की ज़रूरत होती है । अब छोटी कक्षाओं जैसे पहली व दूसरी कक्षा के बच्चों से हम इस तरह के औपचारिक संवाद की अपेक्षा नहीं कर सकते वहां तो छात्र जो कुछ व्यक्तिगत अनुभवों से जानता है। और उसने आसपास के वातावरण से जो कुछ सीखा होता है उसे ही सामने रख पाता है। शिक्षक को उसी ज्ञान को आधार मानकर बच्चे को अपनी भाषा व संवाद से प्रोत्साहित करना चाहिए। एक शिक्षक बच्चों को केवल सिखाता ही नहीं वह बच्चों से सीखता भी है बशर्ते वह भी कभी बच्चा बनकर उन चीजों को सीखने की चाह रखता हो जिन चीजों से वह आजतक अनभिज्ञ रहा और यह सब चीजें शिक्षक को एक बच्चे के सिवा कोई और सिखा भी नहीं सकता। जहां शिक्षक अपनी भाषा व संवाद से बच्चों को सिखाता है वहीं एक बच्चे से भी इसी माध्यम से शिक्षक काफी कुछ नया सीख सकता है।
राजेश वर्मा
(बलद्वाड़ा-मंडी)
9418326409
7018329898



0 comments:
एक टिप्पणी भेजें